बाजरा की खेती (Pearl Millet Farming) – उन्नत तकनीक, संतुलित पोषण एवं अधिक उत्पादन
बाजरा (Pearl Millet) भारत की प्रमुख श्री अन्न (Millets) फसलों में से एक है। इसका वैज्ञानिक नाम Pennisetum glaucum है। यह कम पानी, अधिक तापमान तथा हल्की भूमि में भी सफलतापूर्वक उगाई जाने वाली फसल है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक तथा तेलंगाना में इसकी बड़े पैमाने पर खेती की जाती है।
बाजरा में प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, फाइबर, मैग्नीशियम तथा विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह किसानों के लिए कम लागत और अधिक लाभ देने वाली महत्वपूर्ण फसल बन चुकी है। यदि संतुलित पोषण एवं आधुनिक कृषि तकनीकों के साथ Sadaveer उत्पादों का उपयोग किया जाए तो उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।
बाजरा की खेती का महत्व
- कम पानी में सफल खेती।
- सूखा एवं गर्मी सहन करने की क्षमता।
- कम लागत में अधिक लाभ।
- कम उपजाऊ भूमि में भी अच्छी पैदावार।
- पशु चारे एवं अनाज दोनों के लिए उपयोगी।
- पौष्टिक श्री अन्न (Nutri Cereal)।
उपयुक्त जलवायु
बाजरा गर्म एवं शुष्क जलवायु की फसल है। 25°C से 35°C तापमान इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छी पैदावार देता है।
उपयुक्त भूमि
अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट, दोमट एवं हल्की भूमि इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम रहती है। भूमि का pH 6.5 से 8.0 तक उपयुक्त होता है।
खेत की तैयारी
2–3 जुताई करके खेत को भुरभुरा बनाएं। अंतिम जुताई के समय 8–10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिलाएं।
साडा वीर (Sada Veer)
बुवाई के समय साडा वीर का उपयोग जड़ों के विकास, पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने तथा पौधों की प्रारम्भिक बढ़वार में सहायक होता है।
उन्नत किस्में
- HHB-67 Improved
- HHB-299
- MPMH-17
- ICMV-155
- Pusa Composite-443
- Raj-171
बुवाई का समय
- उत्तर भारत : जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई।
- दक्षिण भारत : वर्षा के अनुसार जून से अगस्त।
बीज दर
4–5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।
बीज उपचार
बीज को ट्राइकोडर्मा, एजोटोबैक्टर एवं पीएसबी कल्चर से उपचारित करें। इससे अंकुरण अच्छा होता है तथा प्रारम्भिक रोगों से सुरक्षा मिलती है।
संतुलित पोषण प्रबंधन
साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट
बाजरा में जिंक, आयरन, बोरॉन, कॉपर एवं मैंगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट का स्प्रे करें। इससे पौधों की हरियाली, प्रकाश संश्लेषण तथा दाना विकास बेहतर होता है।
4G साडा वीर (4G Sadaveer)
4G साडा वीर सीवीड एक्सट्रैक्ट, ऑर्गेनिक एसिड एवं प्राकृतिक वृद्धि हार्मोन से युक्त उत्पाद है। यह पौधों की बढ़वार, अधिक टिलर, मजबूत जड़ें तथा स्वस्थ बालियों के विकास में सहायता करता है।
अनुशंसित मात्रा: 2–4 मिली प्रति लीटर पानी।
- पहला स्प्रे : बुवाई के 20–25 दिन बाद।
- दूसरा स्प्रे : टिलर बनने की अवस्था।
- तीसरा स्प्रे : बालियां निकलने से पहले।
सिंचाई प्रबंधन
- वर्षा आधारित क्षेत्रों में सामान्यतः अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।
- यदि सिंचाई उपलब्ध हो तो टिलर बनने, बालियां निकलने एवं दाना भराव के समय सिंचाई करें।
खरपतवार नियंत्रण
बुवाई के 20–25 दिन बाद पहली निराई एवं आवश्यकता अनुसार 40 दिन बाद दूसरी निराई करें।
फर्राटा (FARRATA 500 ML)
कीटनाशक, फफूंदनाशक अथवा घुलनशील उर्वरकों के साथ फर्राटा मिलाने से स्प्रे का फैलाव, चिपकाव एवं अवशोषण बेहतर होता है तथा दवाओं की प्रभावशीलता बढ़ती है।
प्रमुख रोग
- डाउनी मिल्ड्यू
- अर्गोट रोग
- स्मट रोग
- पत्ती धब्बा रोग
फंगस फाइटर (Fungus Fighter)
फंगस फाइटर फफूंदजनित रोगों की रोकथाम तथा पौधों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला जैविक उत्पाद है।
मात्रा: 2 ग्राम प्रति लीटर पानी।
प्रमुख कीट
- शूट फ्लाई
- तना छेदक
- एफिड
- आर्मीवर्म
कीटों की नियमित निगरानी करें तथा आवश्यकता अनुसार अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें। स्प्रे के साथ फर्राटा मिलाने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।
बालियां एवं दाना विकास
बालियां निकलने से पहले 4G साडा वीर तथा साडा वीर स्प्रे का संयुक्त उपयोग पौधों की बढ़वार, अधिक बालियां एवं बेहतर दाना भराव में सहायता करता है।
साडा वीर स्प्रे मात्रा: 1–2 ग्राम प्रति लीटर पानी।
Sadaveer अनुशंसित स्प्रे शेड्यूल
| फसल अवस्था | अनुशंसित उत्पाद | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| बुवाई के समय | साडा वीर | जड़ विकास एवं पोषण |
| 20–25 दिन | 4G साडा वीर | बेहतर बढ़वार एवं टिलर |
| 35–40 दिन | साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट | सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति |
| बालियां निकलने से पहले | 4G + साडा वीर स्प्रे | अधिक बालियां एवं दाना विकास |
| रोग दिखाई देने पर | फंगस फाइटर | फफूंद नियंत्रण |
| सभी स्प्रे के साथ | फर्राटा | स्प्रे की प्रभावशीलता बढ़ाना |
कटाई
जब बालियां पूरी तरह पक जाएं तथा दाने कठोर हो जाएं, तब फसल की कटाई करें। कटाई के बाद 4–5 दिन धूप में सुखाकर मड़ाई करें।
औसत उत्पादन
- 20–35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (उन्नत किस्मों में)।
- संतुलित पोषण एवं Sadaveer उत्पादों के उपयोग से उत्पादन एवं दानों की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार प्राप्त किया जा सकता है।
आर्थिक लाभ
बाजरा की मांग खाद्य उद्योग, पशु आहार, मल्टीग्रेन आटा तथा स्वास्थ्य उत्पादों में तेजी से बढ़ रही है। कम लागत, कम पानी एवं बेहतर बाजार मूल्य के कारण यह किसानों के लिए अत्यंत लाभदायक फसल है।
निष्कर्ष
बाजरा की खेती आधुनिक कृषि तकनीकों, संतुलित पोषण एवं उचित रोग-कीट प्रबंधन के साथ अत्यधिक लाभदायक सिद्ध होती है। यदि किसान सही समय पर साडा वीर, 4G साडा वीर, साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट, फर्राटा, फंगस फाइटर तथा साडा वीर स्प्रे का उपयोग करें, तो पौधों की बढ़वार, मजबूत बालियां, बेहतर दाना भराव तथा कुल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।