कुट्टू की खेती (Buckwheat Farming) – उन्नत तकनीक, संतुलित पोषण एवं अधिक उत्पादन
कुट्टू (Buckwheat) एक महत्वपूर्ण छद्म-अनाज (Pseudo Cereal) फसल है, जिसे मुख्य रूप से पर्वतीय एवं ठंडे क्षेत्रों में उगाया जाता है। भारत में इसकी खेती उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों में अधिक होती है। कुट्टू का आटा विशेष रूप से व्रत (उपवास) के दौरान उपयोग किया जाता है तथा इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, मैग्नीशियम एवं एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
कुट्टू की खेती का महत्व
- कम समय में तैयार होने वाली लाभदायक फसल।
- कम उपजाऊ भूमि में भी सफल खेती।
- औषधीय एवं पौष्टिक गुणों से भरपूर।
- मधुमक्खी पालन के लिए उत्कृष्ट फसल।
- जैविक खेती के लिए उपयुक्त।
उपयुक्त जलवायु
कुट्टू ठंडी एवं समशीतोष्ण जलवायु की फसल है। 18 से 25°C तापमान इसके लिए सर्वोत्तम माना जाता है। अधिक गर्मी एवं जलभराव फसल के लिए हानिकारक होते हैं।
उपयुक्त भूमि
अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। भूमि का pH 5.5 से 7.0 के बीच होना चाहिए।
खेत की तैयारी
खेत की 2-3 जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाएं। अंतिम जुताई के समय गोबर की सड़ी खाद अवश्य मिलाएं।
साडा वीर (Sada Veer)
खेत की तैयारी या प्रारंभिक वृद्धि अवस्था में साडा वीर का प्रयोग जड़ों के विकास, पोषक तत्वों की उपलब्धता एवं पौधों की प्रारंभिक बढ़वार में सहायता करता है।
उन्नत किस्में
- VL Buckwheat-7
- Himpriya
- PRB-1
- Local Hill Varieties
बुवाई का समय
- मैदानी क्षेत्र : अगस्त – सितंबर
- पर्वतीय क्षेत्र : मई – जून
बीज दर
40–50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर।
बीज उपचार
बुवाई से पहले बीज को जैव उर्वरकों एवं ट्राइकोडर्मा से उपचारित करना लाभदायक रहता है।
पोषण प्रबंधन
साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट
कुट्टू की फसल में जिंक, आयरन, बोरॉन एवं अन्य सूक्ष्म तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट का स्प्रे लाभकारी है। यह हरियाली, फूल एवं दाना बनने में सहायता करता है. :contentReference[oaicite:0]{index=0}
4G साडा वीर (4G Sadaveer)
सीवीड एवं ऑर्गेनिक एसिड आधारित 4G साडा वीर पौधों की वृद्धि, शाखाओं के विकास, फूलों की संख्या एवं दाना भराव में सहायक है। :contentReference[oaicite:1]{index=1}
- पहला स्प्रे : 25–30 दिन बाद
- दूसरा स्प्रे : फूल आने से पहले
सिंचाई
यदि वर्षा पर्याप्त हो तो अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। शुष्क मौसम में फूल एवं दाना बनने के समय हल्की सिंचाई लाभदायक रहती है।
खरपतवार नियंत्रण
बुवाई के 20–25 दिन बाद पहली निराई करें। आवश्यकता होने पर दूसरी निराई करें।
फर्राटा (FARRATA)
यदि खरपतवारनाशी, कीटनाशक या घुलनशील उर्वरकों का स्प्रे किया जा रहा हो तो फर्राटा मिलाने से घोल का फैलाव एवं अवशोषण बेहतर होता है। :contentReference[oaicite:2]{index=2}
रोग एवं प्रबंधन
- पत्ती धब्बा रोग
- जड़ गलन
- डाउनी मिल्ड्यू
फंगस फाइटर (Fungus Fighter)
फफूंदजनित रोगों की रोकथाम एवं पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए फंगस फाइटर उपयोगी जैविक उत्पाद है। :contentReference[oaicite:3]{index=3}
मात्रा : 2 ग्राम प्रति लीटर पानी।
प्रमुख कीट
- एफिड
- थ्रिप्स
- इल्ली
कीट दिखाई देने पर अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें। स्प्रे में फर्राटा मिलाने से प्रभावशीलता बढ़ सकती है।
फूल एवं दाना विकास
फूल आने के समय 4G साडा वीर तथा साडा वीर स्प्रे का उपयोग पौधों की बढ़वार, फूलों की संख्या तथा दाना भराव में सहायक हो सकता है। साडा वीर स्प्रे को 1–2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है। :contentReference[oaicite:4]{index=4}
कटाई
जब अधिकांश पौधे भूरे रंग के हो जाएं तथा दाने कठोर हो जाएं, तब कटाई करें। कटाई के बाद अच्छी तरह सुखाकर मड़ाई करें।
औसत उत्पादन
- 12–18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
- उन्नत प्रबंधन से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक
अनुशंसित Sadaveer स्प्रे शेड्यूल
| फसल अवस्था | उत्पाद | उद्देश्य |
|---|---|---|
| बुवाई के समय | साडा वीर | जड़ विकास एवं पोषण |
| 25-30 दिन | 4G साडा वीर | पौधों की बढ़वार |
| 35-40 दिन | मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट | सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति |
| फूल आने पर | 4G + साडा वीर स्प्रे | फूल एवं दाना विकास |
| रोग की शुरुआत | फंगस फाइटर | फफूंद नियंत्रण |
निष्कर्ष
कुट्टू की खेती कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसल है। यदि किसान समय पर बुवाई, संतुलित पोषण, रोग-कीट नियंत्रण तथा साडा वीर, 4G साडा वीर, साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट, फर्राटा, फंगस फाइटर एवं साडा वीर स्प्रे का सही समय पर उपयोग करें, तो फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।