झंगोरा की खेती

झंगोरा की खेती (Barnyard Millet Farming) – उन्नत तकनीक, संतुलित पोषण एवं अधिक उत्पादन

झंगोरा (Barnyard Millet) श्री अन्न (Millets) की एक अत्यंत पौष्टिक एवं कम अवधि में तैयार होने वाली फसल है। इसका वैज्ञानिक नाम Echinochloa frumentacea है। भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु तथा कर्नाटक में की जाती है।

झंगोरा को कम पानी में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। यह सूखा सहन करने वाली फसल है और कम उपजाऊ भूमि में भी अच्छा उत्पादन देती है। झंगोरा के दानों में आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन, फाइबर तथा एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। वर्तमान समय में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

झंगोरा की खेती का महत्व

  • कम अवधि (70–90 दिन) में तैयार होने वाली फसल।
  • कम पानी एवं कम लागत में खेती।
  • सूखा सहन करने की क्षमता।
  • कम उपजाऊ भूमि में भी अच्छी पैदावार।
  • पौष्टिक श्री अन्न (Nutri Cereal)।
  • जैविक खेती के लिए उपयुक्त।

उपयुक्त जलवायु

20°C से 32°C तापमान झंगोरा की खेती के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में यह फसल अच्छी होती है तथा जलभराव से बचाना आवश्यक है।

उपयुक्त भूमि

दोमट, बलुई दोमट तथा हल्की लाल मिट्टी इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम रहती है। भूमि का pH 5.5 से 7.5 होना चाहिए तथा खेत में जल निकासी अच्छी होनी चाहिए।

खेत की तैयारी

खेत की 2–3 गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाएं। अंतिम जुताई के समय 8–10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिलाएं।

साडा वीर (Sada Veer)

बुवाई के समय साडा वीर का उपयोग जड़ों के विकास, मिट्टी की सक्रियता बढ़ाने तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधारने में सहायक होता है।

उन्नत किस्में

  • VL-172
  • VL-207
  • DHBM-93-3
  • CO (KV) 2
  • PRJ-1

बुवाई का समय

  • खरीफ मौसम: जून से जुलाई
  • पर्वतीय क्षेत्रों में: मई से जून

बीज दर

8–10 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।

बीज उपचार

बुवाई से पहले बीज को ट्राइकोडर्मा एवं जैव उर्वरकों से उपचारित करने पर अंकुरण अच्छा होता है तथा प्रारम्भिक रोगों से सुरक्षा मिलती है।

संतुलित पोषण प्रबंधन

साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट

झंगोरा में जिंक, आयरन, बोरॉन, कॉपर एवं मैंगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर करने के लिए साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट का स्प्रे करें। इससे पौधों की हरियाली, प्रकाश संश्लेषण एवं दाना विकास बेहतर होता है।

4G साडा वीर (4G Sadaveer)

4G साडा वीर सीवीड एक्सट्रैक्ट, ऑर्गेनिक एसिड तथा प्राकृतिक वृद्धि हार्मोन युक्त उत्पाद है। यह अधिक टिलर, मजबूत जड़ें तथा स्वस्थ बालियों के विकास में सहायता करता है।

अनुशंसित मात्रा: 2–4 मिली प्रति लीटर पानी।

  • पहला स्प्रे: बुवाई के 20–25 दिन बाद।
  • दूसरा स्प्रे: टिलर बनने पर।
  • तीसरा स्प्रे: बालियां निकलने से पहले।

सिंचाई प्रबंधन

  • बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई।
  • टिलर बनने की अवस्था।
  • बालियां निकलने की अवस्था।
  • दाना भरने की अवस्था।

अधिक जलभराव से बचें।

खरपतवार नियंत्रण

बुवाई के 20–25 दिन बाद पहली निराई तथा आवश्यकता होने पर 40 दिन बाद दूसरी निराई करें।

फर्राटा (FARRATA 500 ML)

कीटनाशक, फफूंदनाशक अथवा घुलनशील उर्वरकों के साथ फर्राटा मिलाने से स्प्रे का फैलाव, चिपकाव एवं अवशोषण बेहतर होता है, जिससे दवाओं की प्रभावशीलता बढ़ती है।

प्रमुख रोग

  • पत्ती धब्बा रोग
  • झुलसा रोग
  • जड़ गलन
  • फफूंदजनित रोग

फंगस फाइटर (Fungus Fighter)

फंगस फाइटर फफूंदजनित रोगों से बचाव एवं पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला जैविक उत्पाद है।

मात्रा: 2 ग्राम प्रति लीटर पानी।

प्रमुख कीट

  • एफिड
  • लीफ हॉपर
  • तना छेदक
  • कटवर्म

कीटों की नियमित निगरानी करें। आवश्यकता होने पर अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें तथा स्प्रे में फर्राटा मिलाएं।

बालियां एवं दाना विकास

बालियां निकलने से पहले 4G साडा वीर तथा साडा वीर स्प्रे का संयुक्त उपयोग पौधों की बढ़वार, अधिक बालियां तथा बेहतर दाना भराव में सहायक होता है।

साडा वीर स्प्रे मात्रा: 1–2 ग्राम प्रति लीटर पानी।

Sadaveer अनुशंसित स्प्रे शेड्यूल

फसल अवस्थाअनुशंसित उत्पादमुख्य उद्देश्य
बुवाई के समयसाडा वीरजड़ विकास एवं पोषण
20–25 दिन4G साडा वीरबेहतर बढ़वार एवं टिलर
35–40 दिनमल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंटसूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति
बालियां निकलने से पहले4G + साडा वीर स्प्रेअधिक बालियां एवं दाना विकास
रोग दिखाई देने परफंगस फाइटरफफूंद नियंत्रण
सभी स्प्रे के साथफर्राटास्प्रे की प्रभावशीलता बढ़ाना

कटाई

जब बालियां सुनहरी हो जाएं तथा दाने पूरी तरह कठोर हो जाएं, तब फसल की कटाई करें। कटाई के बाद अच्छी तरह सुखाकर मड़ाई करें।

औसत उत्पादन

  • 18–25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
  • उन्नत तकनीक एवं Sadaveer उत्पादों के उपयोग से 28–30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

आर्थिक लाभ

झंगोरा की बढ़ती मांग, उच्च पोषण मूल्य एवं सरकारी स्तर पर मिलेट्स को बढ़ावा मिलने के कारण इसकी खेती किसानों के लिए अत्यंत लाभदायक बन रही है। कम लागत एवं बेहतर बाजार मूल्य के कारण यह भविष्य की महत्वपूर्ण फसल मानी जा रही है।

निष्कर्ष

झंगोरा (Barnyard Millet) की खेती आधुनिक कृषि तकनीकों एवं संतुलित पोषण के साथ अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो सकती है। यदि किसान सही समय पर साडा वीर, 4G साडा वीर, साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट, फर्राटा, फंगस फाइटर तथा साडा वीर स्प्रे का उपयोग करें, तो पौधों की बढ़वार, अधिक बालियां, बेहतर दाना भराव तथा कुल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।