कुटकी की खेती (Little Millet Farming) – उन्नत तकनीक, संतुलित पोषण एवं अधिक उत्पादन
कुटकी (Little Millet) श्री अन्न (Millets) की एक अत्यंत पौष्टिक एवं कम अवधि में तैयार होने वाली फसल है। इसका वैज्ञानिक नाम Panicum sumatrense है। भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में की जाती है।
कुटकी कम वर्षा, कम उपजाऊ भूमि तथा सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फसल है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम एवं एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। वर्तमान समय में श्री अन्न के बढ़ते महत्व के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
कुटकी की खेती का महत्व
- कम पानी में सफल खेती।
- 70–90 दिन में तैयार होने वाली फसल।
- सूखा सहन करने की क्षमता।
- कम लागत एवं अधिक लाभ।
- जैविक खेती के लिए उपयुक्त।
- स्वास्थ्यवर्धक एवं पौष्टिक अनाज।
उपयुक्त जलवायु
20°C से 32°C तापमान कुटकी की खेती के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी अच्छी पैदावार होती है। अधिक जलभराव फसल के लिए हानिकारक होता है।
उपयुक्त भूमि
अच्छी जल निकासी वाली दोमट, बलुई दोमट तथा हल्की लाल मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है। भूमि का pH 5.5 से 7.5 सर्वोत्तम माना जाता है।
खेत की तैयारी
खेत की 2–3 गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाएं। अंतिम जुताई के समय 8–10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिलाएं।
साडा वीर (Sada Veer)
बुवाई के समय साडा वीर का उपयोग जड़ों के विकास, मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने तथा पौधों की प्रारंभिक बढ़वार में सहायक होता है।
उन्नत किस्में
- OLM-203
- JK-8
- BL-6
- LMV-528
- GPU-45
बुवाई का समय
- खरीफ मौसम: जून से जुलाई।
- पर्वतीय क्षेत्रों में: मई से जून।
बीज दर
8–10 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।
बीज उपचार
बीज को ट्राइकोडर्मा तथा जैव उर्वरकों से उपचारित करने पर अंकुरण अच्छा होता है तथा प्रारम्भिक रोगों से सुरक्षा मिलती है।
संतुलित पोषण प्रबंधन
साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट
कुटकी में जिंक, आयरन, बोरॉन, मैंगनीज एवं कॉपर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट का स्प्रे करें। इससे पौधों की हरियाली, प्रकाश संश्लेषण तथा दाना विकास बेहतर होता है।
4G साडा वीर (4G Sadaveer)
4G साडा वीर सीवीड एक्सट्रैक्ट, ऑर्गेनिक एसिड तथा प्राकृतिक वृद्धि हार्मोन से युक्त उन्नत उत्पाद है। यह अधिक टिलर, मजबूत जड़ें, स्वस्थ पौधे तथा अधिक बालियां विकसित करने में सहायता करता है।
अनुशंसित मात्रा: 2–4 मिली प्रति लीटर पानी।
- पहला स्प्रे: 20–25 दिन बाद।
- दूसरा स्प्रे: टिलर बनने की अवस्था में।
- तीसरा स्प्रे: बालियां निकलने से पहले।
सिंचाई प्रबंधन
- बुवाई के बाद हल्की सिंचाई।
- टिलर बनने की अवस्था।
- बालियां निकलने की अवस्था।
- दाना भराव की अवस्था।
अत्यधिक जलभराव से बचें।
खरपतवार नियंत्रण
बुवाई के 20–25 दिन बाद पहली निराई तथा आवश्यकता अनुसार 40 दिन बाद दूसरी निराई करें।
फर्राटा (FARRATA 500 ML)
कीटनाशक, फफूंदनाशक अथवा घुलनशील उर्वरकों के साथ फर्राटा मिलाने से स्प्रे का फैलाव, चिपकाव एवं अवशोषण बेहतर होता है जिससे दवाओं की प्रभावशीलता बढ़ती है।
प्रमुख रोग
- पत्ती धब्बा रोग।
- झुलसा रोग।
- जड़ गलन।
- फफूंदजनित रोग।
फंगस फाइटर (Fungus Fighter)
फंगस फाइटर फफूंदजनित रोगों से सुरक्षा तथा पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला जैविक उत्पाद है।
मात्रा: 2 ग्राम प्रति लीटर पानी।
प्रमुख कीट
- तना छेदक।
- एफिड।
- लीफ हॉपर।
- कटवर्म।
कीटों की नियमित निगरानी करें। आवश्यकता होने पर अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें तथा स्प्रे में फर्राटा मिलाएं।
बालियां एवं दाना विकास
बालियां निकलने से पहले 4G साडा वीर एवं साडा वीर स्प्रे का संयुक्त प्रयोग करने से पौधों की बढ़वार, अधिक बालियां तथा बेहतर दाना भराव प्राप्त होता है।
साडा वीर स्प्रे मात्रा: 1–2 ग्राम प्रति लीटर पानी।
Sadaveer अनुशंसित स्प्रे शेड्यूल
| फसल अवस्था | अनुशंसित उत्पाद | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| बुवाई के समय | साडा वीर | जड़ विकास एवं पोषण |
| 20–25 दिन | 4G साडा वीर | बेहतर बढ़वार एवं टिलर |
| 35–40 दिन | साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट | सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति |
| बालियां निकलने से पहले | 4G + साडा वीर स्प्रे | अधिक बालियां एवं दाना विकास |
| रोग दिखाई देने पर | फंगस फाइटर | फफूंद नियंत्रण |
| सभी स्प्रे के साथ | फर्राटा | स्प्रे की प्रभावशीलता बढ़ाना |
कटाई
जब बालियां सुनहरी हो जाएं तथा दाने पूरी तरह कठोर हो जाएं तब फसल की कटाई करें। कटाई के बाद अच्छी तरह सुखाकर मड़ाई करें।
औसत उत्पादन
- 15–22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
- उन्नत तकनीक एवं Sadaveer उत्पादों के उपयोग से 25–28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
आर्थिक लाभ
कुटकी की मांग स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों, मिलेट आटा, मल्टीग्रेन उत्पादों तथा निर्यात बाजार में तेजी से बढ़ रही है। कम लागत, कम सिंचाई तथा अच्छे बाजार मूल्य के कारण यह किसानों के लिए लाभदायक फसल है।
निष्कर्ष
कुटकी (Little Millet) की खेती आधुनिक कृषि तकनीकों एवं संतुलित पोषण के साथ अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो सकती है। यदि किसान सही समय पर साडा वीर, 4G साडा वीर, साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट, फर्राटा, फंगस फाइटर तथा साडा वीर स्प्रे का उपयोग करें, तो पौधों की बढ़वार, अधिक बालियां, बेहतर दाना भराव तथा कुल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।